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फ़ाउंडेशन असल में किस चीज़ को हिला रहा है
संक्षेप में
शेड मैचिंग एक औसत चुनती है। चेहरों पर बार-बार जो मापा गया है, वह उस औसत के इर्द-गिर्द का फैलाव है — और काउंटर उस हिसाब से सजा हुआ नहीं है।

फ़ाउंडेशन एक रंग की तरह बेचा जाता है। बोतल पर एक नंबर होता है, उस नंबर का एक नाम होता है, और काउंटर पर अपना वाला ढूँढ़ने की एक छोटी-सी रस्म होती है। चेहरे की त्वचा के बारे में प्रत्यक्षण-साहित्य ने जो मापा है, वह एक दूसरी ही राशि है — उसका औसत रंग नहीं, बल्कि यह कि वह रंग एक टुकड़े से अगले टुकड़े तक कितना बदलता है — और इन दोनों को इतनी सफ़ाई से अलग किया जा चुका है कि यह जान लेना क़ीमती है कि आप इनमें से कौन-सा ख़रीद रहे हैं।
यह पृथक्करण आकार को हटा देने से हुआ। Fink, Grammer और Matts ने ऐसे उद्दीपक-चेहरे बनाए जो त्रि-आयामी आकार और सतही स्थलाकृति के लिए मानकीकृत थे, ताकि उनके बीच बचा हुआ इकलौता अंतर त्वचा भर में रंग का वितरण रह जाए — वही वितरण जो जैविक उम्र और जमा हुई धूप के साथ आता है। जिन चेहरों पर युवा त्वचा का एक-सा वितरण था, उन्हें उन चेहरों की तुलना में अधिक युवा, अधिक स्वस्थ और अधिक आकर्षक आँका गया जिन पर बड़ी उम्र की त्वचा का असमान वितरण था। कोई झुर्री नहीं हिली। कोई नक़्श नहीं हिला। दो साल बाद Fink और Matts ने इस रचना को सीधे शब्दों में दोहराया: रंग का वितरण आँकी गई उम्र और आकर्षण को प्रभावित करता है, सतही स्थलाकृति के संकेतों से स्वतंत्र रूप से।
फिर इसे संयुक्त चेहरों पर नहीं, असली त्वचा पर मापा गया। Matts, Fink, Grammer और Burquest ने ग्यारह से छिहत्तर वर्ष की 170 लड़कियों और महिलाओं के गालों की तस्वीरें काटीं और 353 लोगों से उन्हें आकर्षण, सेहत, जवानी और दिखने वाली उम्र पर आँकवाया। तस्वीर की समरूपता तीनों सकारात्मक आकलनों के साथ .40 से ऊपर सहसंबद्ध निकली, और अनुमानित उम्र के साथ −.45। उन्होंने हर तस्वीर को मेलानिन और हीमोग्लोबिन के नक़्शों में भी बाँटा और उनकी एकरूपता अलग-अलग मापी: हीमोग्लोबिन के नक़्शे की समरूपता कच्ची तस्वीर की समरूपता के साथ .92 पर चली, मेलानिन के नक़्शे की .68 पर, और दोनों अनुमानित उम्र के विरुद्ध ऋणात्मक रहीं। कोई अजनबी जिस असमानता को पढ़ रहा होता है, वह नीचे बैठे उन दो रंगद्रव्यों की असमानता है।

यह कोई स्थानीय रुचि नहीं है। Fink और सहयोगी ब्रिटिश महिलाओं के गालों की उसी तरह की तस्वीरें तंज़ानिया के मसाई और बोलीविया के त्सिमाने तक ले गए — ऐसे प्रेक्षक जिनका हल्के रंगद्रव्य वाली त्वचा से रोज़मर्रा का कोई वास्ता ही नहीं है। दोनों समूहों ने समरूप तस्वीरों को ही अधिक युवा और अधिक स्वस्थ चुना, और उन्हें ही पसंद किया।
संवेदनशीलता भी बारीक है। Samson, Fink और Matts ने 61 वर्ष की एक महिला की तस्वीर ली, सतही स्थलाकृति हटाई और रंग की असमानता को 25% के चरणों में चिकना किया, और 160 जर्मन प्रेक्षकों को हर जोड़ी दिखाई। असमानता का एक चौथाई हट जाना ही इतना काफ़ी था कि कौन-सा चेहरा अधिक स्वस्थ कहा जाए, यह बदल जाए। पर ये दोनों संकेत आपस में काम बाँट लेते हैं, और यहाँ मायने रखने वाला हिस्सा यही बँटवारा है: स्थलाकृति उम्र को अधिक मज़बूती से ढो रही थी, रंग का वितरण सेहत को अधिक मज़बूती से। एक क्रीम किसी वितरण को चपटा कर सकती है। वह किसी लकीर को भर नहीं सकती।
मोटे तौर पर यही बात इस उद्योग के अपने उपकरण भी कहते हैं कि फ़ाउंडेशन है क्या। RIKEN के साथ काम कर रहे L'Oréal के एक समूह ने 2024 में एक हाइपरस्पेक्ट्रल विधि प्रकाशित की, जो शुरुआत ही समस्या को स्वीकार करके करती है: कवरेज, वे लिखते हैं, एक अनुभूत गुण है, जिसे अपारदर्शिता या किसी भी एकल प्रकाशीय गुणधर्म से नहीं पकड़ा जा सकता। उन्होंने इसकी जगह जो बनाया वह दो संख्याएँ थीं — एक समरूपता कारक, कि लगाने के बाद चेहरे भर के स्पेक्ट्रम कितना पास आ जाते हैं, और एक स्पेक्ट्रल शिफ़्ट कारक, कि रंग कितना खिसकता है। समरूपता कारक कवरेज की प्रशिक्षित रैंकिंग के साथ-साथ चला। उनकी अपनी चेतावनी ही ईमानदार हिस्सा है: यह भी कवरेज का पूरा वर्णन नहीं करता, और कोई उत्पाद किसी दिए हुए चेहरे को कितना खिसकाएगा, यह उस चेहरे और शेड के बीच के अंतर पर निर्भर करता है। दो काम। एक प्रसरण घटाना, एक औसत खिसकाना। इनमें से सिर्फ़ एक ही वह काम है जिसे बीस साल के प्रत्यक्षण-अध्ययनों ने मापा है।
उसी कंपनी ने यह भी मापा कि एक कामकाजी दिन भर में फ़ाउंडेशन करता क्या है, और ऐसा नतीजा छापा जिसे कोई विज्ञापन नहीं चलाएगा। तीस से चौवन वर्ष की दो सौ सत्तर जापानी महिलाओं ने अपना फ़ाउंडेशन अपने ही तरीक़े से लगाने से पहले, लगाने के तुरंत बाद, और पाँच घंटे बाद अपनी तस्वीरें लीं — 810 सेल्फ़ी, जिन्हें एल्गोरिद्म ने आँका। उम्र के कई कम उभरे हुए चिह्नों में सुधार हुआ। आँख के इर्द-गिर्द की झुर्रियाँ दोनों ही मौक़ों पर, हर आयु-वर्ग में, अधिक गंभीर आँकी गईं, और नासोलेबियल सिलवटें पाँच घंटे पर। परिमाण छोटे थे, एक ग्रेड के दशमलव भर। वे सांख्यिकीय रूप से सार्थक भी थे, और उनकी दिशा उलटी थी।
जिस सीढ़ी पर शेड सजाए जाते हैं, वह तक किसी का किया हुआ चुनाव है। जब L'Oréal ने दुनिया भर के लिए फ़ाउंडेशन की एक शृंखला बनाने के इरादे से फ़्रांसीसी और अमेरिकी कॉकेशियन, जापानी, अफ़्रीकी-अमेरिकी और हिस्पैनिक-अमेरिकी महिलाओं की त्वचा का रंग मापा, तो जो लौटा वह एक बड़ा, सतत, आपस में गुँथा हुआ रंग-आकाश था, जिसके भीतर हर समूह में हल्का, मध्यम और गहरा अलग-अलग पहचाना जा सकता था। उस अध्ययन में सिर्फ़ जापानी महिलाओं ने दीप्ति के पैमाने से इनकार किया, और कहा कि उनकी त्वचा के लिए गुलाबी–गेरू–बेज वाली धुरी अधिक अर्थ रखती है। गहराई इसलिए संयोजक धुरी बनी रही क्योंकि उसे शेल्फ़ पर सजाना आसान है, इसलिए नहीं कि आँकड़ों में वही अकेली धुरी है।
और जिस प्रयोग को यह पूरी रस्म मान बैठी है, वह प्रकाशित ही नहीं हुआ है। जैवचिकित्सा सूचकांकों में ठीक-ठीक मिलाए गए शेड और थोड़ा चूके हुए शेड के बीच, प्रेक्षकों द्वारा आँकी गई, कोई नियंत्रित तुलना खोजिए, तो कुछ भी नहीं लौटता। जो लौटता है वह इतना अजीब है कि उस तरफ़ मुड़ना बनता है: दंतचिकित्सा के शोधपत्र, जहाँ किसी व्यावसायिक फ़ाउंडेशन शेड गाइड का इस्तेमाल दाँत का शेड चुनने से पहले मरीज़ के रंग को वर्गीकृत करने के उपकरण के तौर पर होता है। शेड की सीढ़ी पर इतना भरोसा है कि उससे लोगों को मापा जाता है, और जिस काम के लिए उसे बनाया गया था, उस पर उसे कभी परखा नहीं गया। जबड़े की रेखा से मिलान करना एक कारीगरी है। हो सकता है वह अच्छी कारीगरी भी हो। वह कोई नतीजा नहीं है।
कितना लगाना है, इस बारे में एक चीज़ परखी जा चुकी है, और वह सहज करने वाली नहीं है। Jones, Kramer और Ward ने प्रेक्षकों से कई चेहरों पर मेकअप की मात्रा घटाने-बढ़ाने को कहा — एक बार अपनी रुचि के हिसाब से, एक बार इस हिसाब से कि उनके ख़याल में महिलाओं को क्या पसंद है, एक बार इस हिसाब से कि उनके ख़याल में पुरुषों को क्या पसंद है। जितनी मात्रा उन्हें ख़ुद पसंद थी, उस पर पुरुष और महिलाएँ आपस में सहमत थे; महिलाएँ क्या चाहती हैं, इसे उन्होंने बढ़ा-चढ़ाकर आँका; और पुरुष क्या चाहते हैं, इसे उससे भी अधिक बढ़ा-चढ़ाकर। मॉडलों ने ख़ुद अपने ऊपर जो मेकअप किया था, वह इन सारी सेटिंगों से काफ़ी ऊपर बैठा था।
इसमें से कोई भी बात यह नहीं कहती कि शेड कुछ भी नहीं है। एक औसत जो काफ़ी ग़लत हो, वह कमरे के उस पार से दिख जाता है। यह इतना कहती है कि इस ख़रीद का शेड वाला आधा हिस्सा वह है जिसके नीचे कोई प्रमाण नहीं है, और एकरूपता वाला आधा वह है जिसके नीचे दो दशक का प्रमाण है — और शेल्फ़ ठीक उलटे हिसाब से सजी है। Percol चेहरे के बगल में रखे रंगों को देखकर एक राय लौटाता है। यह उन्हीं जगहों में से एक है जहाँ राय माप से कम क़ीमती है, और काम की चीज़ यह जान लेना है कि आपको इनमें से कौन-सी थमाई गई है।
स्रोत
यहाँ का हर सारांश Percol के लिए लिखा गया है; जिन कामों का हवाला है उनमें से कुछ भी उतारा नहीं गया। स्रोत इसलिए दिए हैं कि पाठक मूल जाकर देख सके।
- Bernhard Fink, Karl Grammer and Paul J. Matts, "Visible skin color distribution plays a role in the perception of age, attractiveness, and health in female faces", Evolution and Human Behavior 27(6), 2006, 433–442
- Bernhard Fink and Paul J. Matts, "The effects of skin colour distribution and topography cues on the perception of female facial age and health", Journal of the European Academy of Dermatology and Venereology 22(4), 2008, 493–498 — जहाँ पहले वाली रचना को दोहराया गया है
- Paul J. Matts, Bernhard Fink, Karl Grammer and Maria Burquest, "Color homogeneity and visual perception of age, health, and attractiveness of female facial skin", Journal of the American Academy of Dermatology 57(6), 2007, 977–984
- N. Samson, B. Fink and P. Matts, "Interaction of skin color distribution and skin surface topography cues in the perception of female facial age and health", Journal of Cosmetic Dermatology 10(1), 2011, 78–84
- Bernhard Fink, Marina Butovskaya, Piotr Sorokowski, Agnieszka Sorokowska and Paul J. Matts, "Visual Perception of British Women's Skin Color Distribution in Two Nonindustrialized Societies, the Maasai and the Tsimane'", Evolutionary Psychology 15(3), 2017
- C. Blaksley, K. Udodaira, A. Nicolas and M. Casolino, "A new method for the evaluation of makeup coverage using hyperspectral imaging", Frontiers in Chemistry 12: 1400796, 2024
- F. Flament and colleagues, "A 5-hour follow-up of the impact on ageing facial signs of some foundations in Japanese women through automatically analysed selfie pictures", International Journal of Cosmetic Science 44(4), 2022, 431–439
- L. Caisey, F. Grangeat, A. Lemasson, J. Talabot and A. Voirin, "Skin color and makeup strategies of women from different ethnic groups", International Journal of Cosmetic Science 28(6), 2006, 427–437
- Alex L. Jones, R. S. Kramer and Robert Ward, "Miscalibrations in judgements of attractiveness with cosmetics", Quarterly Journal of Experimental Psychology 67(10), 2014, 2060–2068
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